इतना गुस्सा ठीक नहीं

“इतना गुस्सा ठीक नहीं है”, अक्सर पापा कहा करते थे। झल्लाया मन सोचता था, “लड़की हूँ इसलिए मुझे ही ज्ञान मिलता है, गुस्से की बात पर तो गुस्सा आएगा ही”। “गुस्सा सेहत के लिए ठीक नहीं होता लाडो रानी”, वह अपनी बात हमेशा लाड लड़ाते हुए पूरी कर देते। पापा का प्रयास निरंतर जारी रहा, मम्मी ने भी उनका साथ निभाया, पर मुझे गुस्सा फिर भी आ ही जाता था।  

जीवन जैसे जैसे आगे बढ़ा, मैं माता-पिता के दायरे से दूर हुई तो जाना “गुस्सा सही में ठीक नहीं”। अब कोई समझाता नहीं है कि गुस्सा ठीक नहीं है, या तो लोग आप से परेशान होकर दूर हो जाते हैं या किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। पर इस गुस्से की वजह से मेरा समय, मन की शांति और सेहत सभी कुछ ख़राब होने लगा। बहुत सोच समझकर यह जाना की जो ठीक नहीं है, उसको क्यों रखा जाए जीवन में। अब मैं गुस्सा करुँगी ही नहीं ,चाहे जो हो जाए।

मैंने गुस्से को कुछ अधिक ही हल्का समझ लिया था। वह पूरे जी जान से अड़ा रहा, कम होने के बजाय लगा कुछ और ही बढ़ रहा। पर मैं भी आदत से ढीठ थी, सो डटी रही। कुछ समय में समझ आया की गुस्सा तो कम हुआ नहीं उल्टा उसके साथ व्यवहार में झल्लाहट और बढ़ गई। हिम्मत टूटने लगी, खुद को अजीब से विशेषण देने लगी जैसे गुस्सैल, अशिष्ट, कठोर और न जाने क्या। मुझे याद नहीं की किसी करीबी ने कभी मुझे ऐसा कहा हो पर मैंने खुद को व्यवहार के मामले में एकदम विफल मान लिया।

पर हारना सीखा नहीं था, कोई तो रास्ता होगा। कोई तो हल होगा। जैसे पापा समझाते थे वैसे मन को समझाया कि रास्ता मिलेगा। गुस्सा न आये इसकी दो ही संभावनाएं है – या तो भगवन आपको गढ़ते समय आप पर विशेष कृपालु बने अन्यथा आप कुछ साधु प्रवृत्ति पा लें। इस तर्क से यह समझ जाना चाहिए कि गुस्से को रोकने की मंशा व्यर्थ और कहीं न कहीं प्रकृति के विरूद्ध है। संभवतः गुस्से के आने में उतनी समस्या नहीं जितनी उसके आने के बाद के व्यवहार के चुनाव से होती है।

गुस्सा आ जाने के उपरांत यह दो बातें काफी विवेचनात्मक होती है

१) आकर बैठ जाए और जाने का नाम न ले

२) गुस्से की मनोदशा में आप क्या कहते हैं या क्या करते हैं

गुस्से पर नियंत्रण की अपेक्षा यदि इन दोनों पर ध्यान केंद्रित किया जाए तो शायद सफलता मिलने के ज्यादा मौके मिल सकते हैं। मैंने भी इन पर काम किया। 

१) जैसे ही लगा की माहौल कुछ ऐसा बन रहा जहां गुस्से का आगमन हो सकता, खुद को थोड़ा चौकन्ना किया।  ऐसे में उस माहौल से दूरी बना लेने से भी फायदा हुआ।  थोड़ा समय मिलने से दिमाग पर छाया धुआँ छट जाता है और स्थिति ज्यादा अच्छे से समझ आ जाती है।

२)  जब गुस्सा हावी हो तो कम से कम ५ मिनट का मौन धारण कर लेती हूँ। बाद में चाहे अपने तर्क पूरे जोश से रख देती हूँ पर उस समय आवेश में कुछ अनचाहे शब्द कहने से खुद को बचा लेती हूँ ।

कुछ साल के निरंतर प्रयास से अब यह हुआ है कि कुछ तो गुस्सा कम आने लगा है। और जब आता है तो कम से कम ऐसा कुछ नहीं होता जिसका बाद में पछतावा हो। ऐसा नहीं है की कार्य पूर्ण हो गया, यह जीवन भर का संघर्ष है, संयम का संघर्ष। खुद को संभालने का, सवारने का संघर्ष।

बहरहाल पापा के सामने गुस्सा अभी भी आ ही जाता है। पर अब वह कुछ ऐसा कहते है, ” हमने तो सुना था हमारी बिटिया को अब कम गुस्सा आता है । “