ढलते जीवन की लाचारी

धीमी गति, कांपता बदनबुझी आँखें, गुमशुदा स्वपन। ऐसे में कोई तो आएपलभर साथ का एहसास दे जाए । हम भी भागा करते थे कभीन जाने कब ज़माने की रफ्तार बढीहम ढूंढते रहे,  कारवां आगे बढ़ गया ।कम्बख्त जिन्दगी भी अजीब हैजिस भीङ के लिए जिएआज उसी भीड़ मे अकेले रह गए । अंत तो कभी … Continue reading ढलते जीवन की लाचारी